गुरुवार, 30 मई 2013

जिन्दगी के रंग


जिंदगी के सारे रंग चुन लाई थी
सपनों के सतरंगी इन्द्रधनूष के साथ
फूलों से लदी  डाली बनकर
और कूद पडी थी होली से इस
अग्निकुंड मे
बडी उम्मीद और आरजु के साथ
फिर तुम भी तो आये थे मेरे साथ
रंग-बिरंगी फूलों कि बहार और
ख़ूबसूरत रंगों की बौछार बनकर
इस अग्निकुंड में शितलता देने
तुमने
सागर सा समेट लिया था मुझे
अपने आगोश मे दृढ़ बंधन के साथ
फिर मैने भी कभी कोशिश नही की
तुम्हारे इस आगोश से छूटने की
कि  ये सिलसिला सदा बना रहे
और आज                                                      
रंग-बिरंगी फूलों कि बगियाँ बन
इठला रहे है खूशबु बिखेरे चारो ओर
सपनों के ये इन्द्रधनूषी रंग
विस्तृत हो चुके है आकाश भर
सदा एकरुप होकर अपनी आभा बिखेरने

नयना(आरती) कानिटकर
३०/०५/२०१३

गुरुवार, 23 मई 2013

तुम मुझसी ही तो दिखती हो

प्रिय बेटी,अभिलाषा
आज तुम्हारा जन्मदिन है और मे तुमसे दूर यहाँ सिर्फ़ "बधाईयाँ "इतना ही  कह पा रही हूँ।
किंतु सुनो!!!!

तुम मुझ सी ही तो दिखती हो
सतत कर्मनिष्ठा,
अथक प्रयास
जुझारू प्रवृत्ति
मर्यादा का भान
सब कुछ पिछे छोड
आगे बढने के गुण
तुम मेरा प्रतिबिम्ब हो
तुम मुझ मे और मैं तुमसे हूँ
तुम मुझ सी ही तो दिखती हो

गुरुवार, 9 मई 2013

प्रसव वेदना


  आसाँ नहीं है माँ होना

 जब उठी है प्रसव वेदना
माँ तुम बहुत याद आई
तैर गयी नैनो में मनको सी
तुम्हारे मुख  की वे सब भंगिमाएँ
.
याद आ गये वो सारे क्षण
जब हमने समझा आपको
अनगढ, अनपढ इस नई पीढ़ी मे
रुखेपन से किया था मुल्यांकन भी
.
क्रोधित होकर मन की खीज
निकालते रहे सदा तुम पर
अपमानित कर पद दलित सा
सदा किया तुम्हें अधोरेखित
.
तहाकर रख दिया था हमने
तुम्हें रसोई की चार दिवारी में
सिर्फ़ बनाने खिलाने तक सीमित कर
उपेक्षित सी जहाँ तुम
अविरल सहलाती रही
स्वंय के हाथों के छालो को
.
घसिटते रहे सदा चौके-चुल्हे में
फिर भी अधिकार जता सारा तुम पर
लेकर ममत्व के ताने बाने का आधार
पकड़ा सदा तुम्हारे आँचल का छोर
.
मेरे आसपास तुम्हारा मंडराना
सह नही पाती थी मैं
तुम्हारी सीधी सपाट बात भी
टोकना लगता था मुझे
.
याद आती है तुम्हारी
भोली सी मधुर मुस्कान
जब तुम चिन्तातुर होकर कहती
"जल्दी लौट आना बेटी"
.
तुम्हारे काम की हरदम
तल्लीन उठा पटक को
हमने कोई मान नही दिया
ये तो हर माँ ,नारी करती है
वनों मे भी तो फलते-फुलते है पेड-पौधे
बिना किसी अतिरिक्त संरक्षण के
फिर भी तुमने अपना सारा स्नेह
उडेल दिया था हम पर चुपचाप
बीना किसी अपेक्षा के
.
पेट मे उस जीव की गती से भी
पूर्ण शरीर वेदना से भर उठता है
फिर याद आता है तुम्हारा
वो म्लान,थका,उपेक्षित
किंतु मुस्कुराता चेहरा
.
समझ सकती हुँ मैं
तुम्हारी व्यथा को,पीडा को
इसीलिये इतना आसान नही है
माँ की पदवी से विभूषित होना