बुधवार, 3 जून 2026

भोपाल से सानफ्रांसिस्को की हवाई उड़ान के बीच "प्राग " की यात्रा

भोपाल से सानफ्रांसिस्को  की हवाई उड़ान के बीच  "प्राग " की यात्रा 


इस पुस्तक को  प्रवास के दौरान जैसे ही मैंने पढ़ना आरम्भ किया समझ आने लगा की प्राग का सफ़र तेज कदमो से नहीं बल्कि हौले हौले करना होगा जिसमे "प्राग "(चेक गणराज्य  की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक राजधानी) के इतिहास के साथ साथ संवेदनाओ की अनुभूति होगी , प्रेम होगा , अधूरापन होगा , वैचारिक उठा-पुथल भी होगी .

यह उपन्यास प्राग का सफ़र  ही नहीं उन दो लोगो के अधूरे प्रेम की कहानी है जो अपने स्वयं के अधूरेपन को खोज रहे है या ये कहा सकते है अपने अधूरेपन  को शब्दों और रंगो से भरने की कोशिश में  अचानक एक दूसरे के साथ आते है, बातें करते है , बार बार मिलते भी है कभी  कैफे में,  कभी ओल्ड टाउन स्क्वायर ,कभी चार्ल्स ब्रिज पर  वाल्तावा नदी के साथ चलते है तो कभी कुछ  पुरानी दुकानों पर ऐंटीक वस्तुओ में भी रंग और शब्द भरने की कोशिश करते है. प्राग की ये ठंडी सड़कें उस अनसुलझे अधूरेपन , एकाकीपन की पृष्ठभूमि न बनकर उनके आत्मचिंतन को साथ लेकर चलती है.  

लेखक काफ्का के लेखन से प्रभावित दिखते है जिसमे उनके उल्लेखानुसार  लगता है काफ्काअधूरेपन और एकाकीपन को केंद्र में रखकर लेखन करते होंगे (क्योकि काफ्का को मैंने कभी पढ़ा नहीं है )

कबीर और केसर की आत्मीयता की और बढ़ती यह कहानी लगातार आत्मस्वीकृति और प्रश्नो की खोज करते हुए चलती है . इसके कुछ संवाद हमें भी विचारों की ओर प्रवृत्त करते है . 

  एक मूल भारतीय लेखक का प्रेम कहानी के साथ यूरोप की जगहों कैफे, वाइन , वह की संस्कृति का  वर्णन पढ़कर  कई बार ऐसा लगता है  मानो वह जन्म से ही गुजरा है . यही समझ आता है की उसने अनेक यूरोपियन लेखकों को पढ़ा है आत्मसात किया है जिसकी छाया उनके लेखन में तरलता से उभरकर सामने आती है. 

.लेखक आरंभ में ही लिखता है की कुछ ऐसा है जिसके बिना मैं अधूरा हूँ मुझे यह तक नहीं पता की वह क्या है बस इतना जानता हूँ कि उसे ढूंढना जरूरी है और कही भीतर एक डर हमेशा बैठा है कि अगर मरने से पहले मैंने इसे नहीं ढूढ़ा तो मेरा जीवन बस एक  अधूरी गवाही बनाकर रहा जाएगा .

हम सब किसी न किसी खोए हुए टुकड़े की तलाश में जीते है ओर यही तलाश हमें इंसान बनाए रखती है . अंत में जब वह टुकड़ा मिलता है तब मृत्यु के आखरी सात मिनट बचे होते है . 


लेखक की कुछ पंक्तियाँ   बहुत विचारक है,  कई पंक्तियों ने मुझे प्रभावित किया है  जैसे:- 

1) " भुला दिए जाने का डर मौत से भी गहरा होता है क्योंकि मौत एक अंत है पर भुला दिया जाना एक लम्बा अँधेरा जिसमे जिन्दा रहते हुए भी हम खो जाते है ."

2) " कुछ चीजों को खो देने के बाद  ही हम उन्हें समझ पाते है शायद यही जीवन का सबसे बड़ा सच है . कभी कभी हमें खुद को खोने की जरुरत होती है ताकि हम फिर से खुद को पा सके ."

3)"  हम सभी अपने भीतर की  चुप्पियों को ढोते  रहते हैमगर किसी अनजान नज़र से टकराने पर अचानक वह मौन टूटकर बिखर जाता है यही वजह है कि किसी से अचानक मुलाकात  सिर्फ मुलाकात नहीं होती बल्कि दो अधूरी कहानियों का   संगम होती है 

4)" दोस्ती सिर्फ  एक रिश्ता नहीं होती एक ताकत नहीं होती है जो तुम्हारे भीतर की सबसे गहरी ऊर्जा को जगा देती है . 

5)" तस्वीरों की सबसे अजीब बात यह है कीवो हमेशा अधूरी होती है .वो मुस्कान दिखा देती है , रंग दिखा देती है लेकिन थकान डर या अनकही बातें नहीं दिखा पाती . कुछ रिश्ते भी ऐसे ही होते है . "

6)' तस्वीरें  दर असल आइना ही होती है बस फर्क इतना है कि वो वक्त दिखती है जो कभी वापस नहीं आता , आज हम जैसे है  कल वैसे नहीं रहते. "

7)' नक्शा रास्ता तो दिखा सकता है लेकिन उसपर चलने की थकन नहीं बता सकता . 


पुस्तक महज प्राग या कबीर-केसर  के अधूरे  प्रेम  की यात्रा नहीं बल्कि खुद को समझने की एक परिक्रमा भी है . 

उपरोक्त  बातो से लेखक प्रभावित  करता है . उसे विस्तृत  वाचकीय  फलक  चाहिए तो गूढ़ आद्यात्मिक चिंतन से निकलकर जन सामान्य में पैठ बढ़ाने  के लिए सहज होना होगा . ये किसी से तुलना नहीं महज एक इच्छा है कि लेखक जन-जन में  पहचाना जाए.

लेखक की दूसरी रचना का इंतज़ार रहेगा.  

अग्रिम शुभकामनाएँ









बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

साल नया है


 

जश्न चल रहा यहाँ वहाँ,लो आता साल नया है

सोच रहीअसमंजस में क्या,सच में कुछ बदला है 


फैले है दहशत के लम्हें ,  आँखो में खून भरा है 

अम्मा का संदूक  खुला है, प्यार मगर बदला है 


दुष्ट खड़ा है सीना ताने,, बेेटी डरी हुई है 

काले सिक्को की खन-खन से, सत्य न्याय बदला है 

 

 आर्त की चीखों से  धरती,हर दिन दहल रही  है 

तारीकी की चादर ओढ़े,  शहर मेरा बदला है 


 धुंध छंट रही हौले-हौले, ,भोर उजास खिली है 

फटी शर्ट-निकर में बच्चे, गाँव कहाँ बदला है 


तम को काट रहा है भानु,, प्राची में उतर रहा है

हाय गुम गई मानवताबस, कैलेंडर  बदला है

 

©नयना (आरती) कानिटकर

रविवार, 1 अक्टूबर 2023

मेरी दादी

 अपनो से दूर  देवता  की शरण में जा बसे अपने बुजुर्गो को याद करने का समय

 

मेरी दादी!!
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मेरे मन के कोने में बसी है 

मेरी दादी की वह छोटी सी संदूक 

उसे जब भी वह खोलती 

हम दोनों बहनें बैठ जाती 

अगल-बगल ताकाझाँकी करने

भाई भी खड़ा होता बगल में कभी कभी 

दादी गुस्सा करती 

चलो! परे हटो कोई धन नहीं गड़ा है इसमें 

वो तो बस सहेजती थी कभी कभी अपना सामन 

जिसमे होती थी बस दो-तीन साधारण सूती 

नौ वार धोती , दो झक सफेद अपने हाथ की सिली 

अंगिया (ब्लाउज)


एक सफेद धागे की गिट्टी और सुई 

एक छोटी कैची , एक बहुत पुराना सा पिद्दू चाकू 

जिसे वो हमेशा अपने सिरहाने रखती 

एक अमृतांजन  बाम की शीशी 

मात्रा दस पैसे वाला एक हवाबाण हरड़े का पाऊच

जिसमे होती  थी  बस पांच या छ: गोली 

हम अपनी  हथेली  फैला देते 

वो धर देती  हमारे हाथ एक-एक गोली 

फिर खोलती धीमे से अपना बटुआ 

चारों  और नजर घुमाती कोई देखा तो नहीं रहा 

जबकि उसमे होती थी मुश्किल से पांच-सात रुपयों की चिल्लर 

उन्हें भी सौ -सौ  बार गिनती 

फिर नजर दौड़ती अपने आजू बाजू 

छोटे भाई के हाथ थमा देती चवन्नी 

हम दौड़कर ले आते "नरेन" की दूकान से 

एक *पारले जी* का पैकेट 

बाट लेते आपस में और  :) मुँह में  दबाकर ऐसे खाते 

कि कही  चोरी ना पकड़ी जाए 

बक्से में सहेजे रहती पीतल की एक छोटी  सी चिमटी 

आजकल के प्लकर जैसी 

उसे चुभते थे अपनी पलकों के बाल 

आँखो की निचली कोर पर 

जिसे निकाल देते थे हम 

खींचकर चिमटी से 

चुभन हटने पर छोड़ती थी गहरी सांस 

कहती पता नहीं कब तक 

सहनी  है ये चुभने 

चौदह बच्चों को जनने वाली 

दस जिन्दा बच्चों की माँ 

बस उन्हें पालने में ही खप गयी होगी

©नयना (आरती)कानिटकर

०१/०१/२०२३ 

 

  


गुरुवार, 17 नवंबर 2022

 कितना मौन 

कितना संवाद ,

कितना निर्मित

कितना क्षरित, 

कितना अधिक 

कितना अल्प,

कितना कलुष 

कितना उत्सव,

कितना दान

कितना प्रतिदान,

कितना आकर्षित

कितना परिवर्तित,

कितना जाना 

कितना छोड़ा,

सब  संचित इस तहखाने में। 


कितनी  स्थिरता 

कितनी चंचलता, 

कितनी उद्विग्नता 

कितनी उदारता, 

कितनी तपस्या

कितनी व्यग्रता, 

कितनी देयता 

कितनी उपादेयता, 

कितनी साधना 

कितनी प्रेरणा,

कितनी  तिक्त

कितनी उदात्त,


क्या कुछ शेष अब 

इस जीवन में  

©आरती कानिटकर "नयना"



शनिवार, 15 जनवरी 2022

#स्वस्थ रहो मस्त रहो

 हमारे जीवन में सदा ही कुछ ना कुछ अच्छा -बुरा घटित होता रहता है। सबकुछ अच्छे के बीच अचानक कुछ ऐसा घट जाय जो आपकी गति को थाम ले तो लगता है कुछ समय के लिए घड़ी ने भी ठहर जाना चाहिए ताकि कैलेंडर की तारीखें भी थम जाए और हम अपने जीवन की लय को पुनः गतिमान होने तक थामते हुए धीरे -धीरे आगे बढ़े।

दिसम्बर माह समाप्ति की ओर था ,प्रकृति भी अपना रंग जोरो से दिखा रही थी । हवा ,बारिश , रोंगटे कड़े करने वाली ठण्ड जोर पर थी तो दूसरी तरफ नए साल की आमद भी मन में खुशियों के रंग भरने तैयार खड़ी थी ।

 इतनी सारी एहतियातन चाक-चौबंद के बाद तो किसी गड़बड़ी की आशंका थी ही नहीं । नियमित घूमना ,योग ध्यान , प्राणायाम , खानपान की व्यवस्थित देखभाल के बाद तो ओर भी नहीं ,पर गड़बड़ हुई। शरीर की इतनी पहरेदारी के बाद भी कोई दरवाजे की इस जरासी झिरी से अंदर प्रवेश कर गया जो अबूझ था । सुरक्षा के सारे प्रबंध हाथ में होते हुए उसने गति को रोक ही  लिया कुछ समय के लिए ।

लम्बे समय की सतर्कता पूर्ण जीवनशैली  के बावजूद जरासी भूल ने सारे किए धरे पर पानी फेर दिया और गाजे-बाजे के साथ गृह प्रवेश कर ही लिया . अतिथि देवो भव अब आ ही गए हो तो अपना सामायिक आतिथ्य लो और चुपचाप लौट जाओ ।😀

इस हर पल रंग और शरीर बदलते घुमन्तु रोगाणु ने हमसे क्या लिया ये तो वक्त बताएगा लेकिन पुरे दो साल बाद मिले माँ-बाबा , भाई-भाभी के संग मस्ती भरे दिन गुजरने की अभिलाषा लिए अपने घर (भारत) में आयी बिटिया के अनमोल  पल वो जरूर छीनकर ले गया ।

अपने घर आकर ठण्ड के विशेष व्यंजन --गाजर हलवा, सरसों का साग , मक्का की रोटी , तिल-गुड़ लड्डू /बर्फी , मराठियों की ख़ास गुलपोली , दिवाली  में ना खा सकी ऐसे  खास व्यंजन चकली, अनारसा के लिए की गयी सारी तैयारियां बांट जोहा रही की ये मुआ कब बाहर निकले और माँ की रसोई खुशबुओं से सारोबार हो जाए ।

खैर बेमौसम जो मेघ आते है और बीत जाते है , इसने भी  कल चले जाना है। शरीर को वापस अपने कर्म की ओर लौटना ही है । रात ही ना हो तो दिन कैसा ? नकारात्मक या सकारात्मक होने की बजाय यदि हम आने वाली हर परिस्थिति के लिए स्वीकारात्मक हो जाए तो रुकावटों का ये प्रतिरोध अपने आप छट जाता है । है ना सौ टेक की बात 😍साथियों

#स्वस्थ रहो मस्त रहो 

नयना (आरती )कानिटकर 


१५/०१/२०२२ 

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021


 यह तो प्रकृति का नियम है विगत को छोड़ नए पर्ण धारण कर जब धरा मुस्काती है  तब सूर्य की  किरणें और चन्द्रमा की शीतल चांदनी उसके सौंदर्य में वृद्धि करती है।  2021 विदा होने को है , नयी  उम्मीदों  की आहट  द्वार खड़ी दस्तक दे रही है .  

सन २० और २१ कोरोना की महामारी के भय से गुजरा । निराशा और डर के बीच भी मानव ने नित  नए प्रयास किए उदासीनता को दूर भागने के । कही वो सफल हुआ कही असफल लेकिन  हर एक का जीवन पृथ्वी की तरह अपनी निश्चित धुरी पर घूमता रहा ।

आशा -निराशा के इन बादलों ने बहुत शोर मचाया , कभी  बहुत बरसे भी पर जीवन की चाह रोज नया सूरज लेकर उदित हुई । 

झंझावातो का जबरदस्त शोर उठा मेरे कुछ परिचित , कुछ महाविद्यालयीन जीवन के सहपाठी अचानक उम्र के इस मध्य दौर में अपने अपने परिवार को निसहाय छोड़ इस दुनिया से कूच कर गए, अपने पीछे छोड़ गए बस यादे! यादें!

साथ ही इन दिनों सोशल मिडिया ने  अपने वक्त के ४०-४२ साल पुराने स्कुल के  साथियों भी मिलवाया जिनका  साथ  सीधा -सच्चा ,अपनत्व भरा  होता है कोई स्वार्थ नहीं  :) . बचपन के साथी  तो अनमोल धरोहर से होते है।

इन कठिन परिस्थितियों के बीच युवा पीढ़ी ने आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ा , भौतिकता के प्रति मोह कम हुआ । परिवार ,समाज दैहिक रूप से तो दूर हुआ परन्तु भावनाओ के साथ करीब भी आया । प्रतियोगिता, जलन ईर्ष्या को दूर भगा अपनो ने अपनो से भी मिलवाया ।

आकाश में उड़ने वाला मानव धरातल पर लौटने लगा ।क्षणिक आवेग ने कुछ को लील लिया तो कुछ पुनरुथान का संकल्प ले उठ खड़े हुए , आगे बढे ।

योग और आयुर्वेद तो भारत की आत्मा थे लेकिन इसका महत्त्व अब-तक गिने -चुने लोग ही समझ पाए थे .धीरे धीरे लोग योग,ध्यान की और बढ़ने लगे ,इसे अपनी दैनिक नियमावली में शामिल कर लिया ।

बस! ऐसी ही अनेक विषम परिस्थति के आकलन के दौरान अनुभव लेते हुए मैंने अपने लेखन को सकारात्मकता की ओर मोड़ा ।

पिछले पूरे एक वर्ष मैंने सिर्फ *प्रेम* पर लिखा जो चाहे जीया नहीं गया था पर शब्दों से महसूस किया जिससे दिमागी तरंगे भी सकारात्मक और खुशहाल महसूस  करे . उसपर भी आंधी  तूफ़ान उठे . मेरे इनबॉक्स में आकर कई  लोगो ने वैयक्तिक होकर प्रश्न पूछे । उनका जवाब देने की   जगह मैंने उन्हें अनदेखा/ दुर्लक्षित  किया क्योकि *प्रेम* को किसी परिभाषा में बांधना मेरे लिए संभव नहीं है । हाँ! मैं  प्रेम में थी जिंदगी के और हूँ भी  स्नेह, प्रेम ,लगाव के बिना मानव जीवन अधूरा है फिर भी पता नहीं ... मानव हर बात  को  गलत दिशा क्यों पहले पकड़ता है .खैर 

राजनीती में तो गुट होते ही है लेखक समाज भी इससे अछूता नहीं है यह जानती थी पर इसी दौरान  ये खुलकर दिखाई दिया . 

वैयक्तिक और सामाजिक अनुभवों का पिटारा इतना भर गया है  कि मन मोह-माया से अलग अपनी धून में रमने लगा है . बस ! अब नए साल को अनुभव करना है..  

"स्वयं  से स्वयं  के साक्षात्कार के साथ "

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© नयना (आरती ) कानिटकर



गुरुवार, 4 मार्च 2021

*मेरा भाई*

*मेरा भाई*


नजर में बसा है 

तेरा बचपन 

चाहे पार किए  हो बावन 


खेला करते थे हम 

अष्ट -चंग की गोटियाँ


तुम खींचा करते थे 

छोटी बहन की चुटिया


कुँए से पानी खींचा करते थे 

घर आँगन सींचा करते थे  


नज़र में बसा करता है 

अब भी वो बचपन 


यशस्वी हो सदा तुम  जग में 

नहीं कंटक हो तुम्हारे पथ में 


भाभी संग खुशियों की कलियाँ 

हँसी की अनगिनत लड़िया


माँ -बाबा संग साथ तुम्हारे

विश्वा- देव भी जीवंत तारे

 

आओ माथे पर टिमकाना लगाऊ

दुनिया की बुरी नजरों से बचाऊ




*** जन्मदिवस  की अनेकानेका शुभकामनाएँ भाई ****


©नयना(आरती)कानिटकर

०५/०३/२०२१