भोपाल से सानफ्रांसिस्को की हवाई उड़ान के बीच "प्राग " की यात्रा
इस पुस्तक को प्रवास के दौरान जैसे ही मैंने पढ़ना आरम्भ किया समझ आने लगा की प्राग का सफ़र तेज कदमो से नहीं बल्कि हौले हौले करना होगा जिसमे "प्राग "(चेक गणराज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक राजधानी) के इतिहास के साथ साथ संवेदनाओ की अनुभूति होगी , प्रेम होगा , अधूरापन होगा , वैचारिक उठा-पुथल भी होगी .
यह उपन्यास प्राग का सफ़र ही नहीं उन दो लोगो के अधूरे प्रेम की कहानी है जो अपने स्वयं के अधूरेपन को खोज रहे है या ये कहा सकते है अपने अधूरेपन को शब्दों और रंगो से भरने की कोशिश में अचानक एक दूसरे के साथ आते है, बातें करते है , बार बार मिलते भी है कभी कैफे में, कभी ओल्ड टाउन स्क्वायर ,कभी चार्ल्स ब्रिज पर वाल्तावा नदी के साथ चलते है तो कभी कुछ पुरानी दुकानों पर ऐंटीक वस्तुओ में भी रंग और शब्द भरने की कोशिश करते है. प्राग की ये ठंडी सड़कें उस अनसुलझे अधूरेपन , एकाकीपन की पृष्ठभूमि न बनकर उनके आत्मचिंतन को साथ लेकर चलती है.
लेखक काफ्का के लेखन से प्रभावित दिखते है जिसमे उनके उल्लेखानुसार लगता है काफ्काअधूरेपन और एकाकीपन को केंद्र में रखकर लेखन करते होंगे (क्योकि काफ्का को मैंने कभी पढ़ा नहीं है )
कबीर और केसर की आत्मीयता की और बढ़ती यह कहानी लगातार आत्मस्वीकृति और प्रश्नो की खोज करते हुए चलती है . इसके कुछ संवाद हमें भी विचारों की ओर प्रवृत्त करते है .
एक मूल भारतीय लेखक का प्रेम कहानी के साथ यूरोप की जगहों कैफे, वाइन , वह की संस्कृति का वर्णन पढ़कर कई बार ऐसा लगता है मानो वह जन्म से ही गुजरा है . यही समझ आता है की उसने अनेक यूरोपियन लेखकों को पढ़ा है आत्मसात किया है जिसकी छाया उनके लेखन में तरलता से उभरकर सामने आती है.
.लेखक आरंभ में ही लिखता है की कुछ ऐसा है जिसके बिना मैं अधूरा हूँ मुझे यह तक नहीं पता की वह क्या है बस इतना जानता हूँ कि उसे ढूंढना जरूरी है और कही भीतर एक डर हमेशा बैठा है कि अगर मरने से पहले मैंने इसे नहीं ढूढ़ा तो मेरा जीवन बस एक अधूरी गवाही बनाकर रहा जाएगा .
हम सब किसी न किसी खोए हुए टुकड़े की तलाश में जीते है ओर यही तलाश हमें इंसान बनाए रखती है . अंत में जब वह टुकड़ा मिलता है तब मृत्यु के आखरी सात मिनट बचे होते है .
लेखक की कुछ पंक्तियाँ बहुत विचारक है, कई पंक्तियों ने मुझे प्रभावित किया है जैसे:-
1) " भुला दिए जाने का डर मौत से भी गहरा होता है क्योंकि मौत एक अंत है पर भुला दिया जाना एक लम्बा अँधेरा जिसमे जिन्दा रहते हुए भी हम खो जाते है ."
2) " कुछ चीजों को खो देने के बाद ही हम उन्हें समझ पाते है शायद यही जीवन का सबसे बड़ा सच है . कभी कभी हमें खुद को खोने की जरुरत होती है ताकि हम फिर से खुद को पा सके ."
3)" हम सभी अपने भीतर की चुप्पियों को ढोते रहते हैमगर किसी अनजान नज़र से टकराने पर अचानक वह मौन टूटकर बिखर जाता है यही वजह है कि किसी से अचानक मुलाकात सिर्फ मुलाकात नहीं होती बल्कि दो अधूरी कहानियों का संगम होती है
4)" दोस्ती सिर्फ एक रिश्ता नहीं होती एक ताकत नहीं होती है जो तुम्हारे भीतर की सबसे गहरी ऊर्जा को जगा देती है .
5)" तस्वीरों की सबसे अजीब बात यह है कीवो हमेशा अधूरी होती है .वो मुस्कान दिखा देती है , रंग दिखा देती है लेकिन थकान डर या अनकही बातें नहीं दिखा पाती . कुछ रिश्ते भी ऐसे ही होते है . "
6)' तस्वीरें दर असल आइना ही होती है बस फर्क इतना है कि वो वक्त दिखती है जो कभी वापस नहीं आता , आज हम जैसे है कल वैसे नहीं रहते. "
7)' नक्शा रास्ता तो दिखा सकता है लेकिन उसपर चलने की थकन नहीं बता सकता .
पुस्तक महज प्राग या कबीर-केसर के अधूरे प्रेम की यात्रा नहीं बल्कि खुद को समझने की एक परिक्रमा भी है .
उपरोक्त बातो से लेखक प्रभावित करता है . उसे विस्तृत वाचकीय फलक चाहिए तो गूढ़ आद्यात्मिक चिंतन से निकलकर जन सामान्य में पैठ बढ़ाने के लिए सहज होना होगा . ये किसी से तुलना नहीं महज एक इच्छा है कि लेखक जन-जन में पहचाना जाए.
लेखक की दूसरी रचना का इंतज़ार रहेगा.
अग्रिम शुभकामनाएँ
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